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पुलिस आई झुग्गियां तोड़ी, झुग्गियां जली/जलाई गई अब सब खामोश हैं

खुसरो पार्क की उजाड़ दी गई झुग्गी बस्ती।

“यहां से जाओ, हालात खराब मत करो।” – राम निवास (इंस्पेक्टर)
“इनके छोटे बच्चे हैं ये कहां जाएंगे।” – मुस्कान (दूसरी कक्षा की छात्रा और पास की फैक्ट्री में रहती है)
यह दो वाक्य हमें निजामुद्दीन दरगाह के पास अमीर खुसरो पार्क की झुग्गियां टूटने पर सुनाई दिए। यह दो ऐसे लोगों का बयान है जिनकी उम्र, शिक्षा और अनुभव का फासला बहुत बड़ा है।

निजामुद्दीन दरगाह के पास बहुत से लोग भीख मांगते, सफाई करते, कार पार्किंग कराते या कूड़ा बीनते आपको दिख जाएंगे। इन लोगों के रहने का स्थान फुटपाथ या अमीर खुसरो पार्क की झुग्गी थी, जहां पर ये जाकर दो वक्त की रोटी खाते और सो जाते थे। 16-17 मई को इनकी लगभग 325 झुग्गियां डी.डी.ए. द्वार तोड़ दी गई और इसी दौरान उनमें आग लग गई। यह बस्ती लगभग 13 साल पुरानी है, इसमें पहले बहुत कम झुग्गियां थी। 18 दिसम्बर, 2012 को निजामुद्दीन डी.डी.ए. पार्क से लोगों को हटाकर खुसरो पार्क में रहने को कह दिया गया, जिसके बाद यहां पर 325 के लगभग झुग्गियां हो गई। यहां पर किसी का राशन कार्ड नहीं बना लेकिन ज़्यादातर लोगों के पास पहचान के नाम पर आधार कार्ड है, जिस पर पते की जगह खुसरो पार्क तथा बेघर (होमलेस) लिखा गया है।

झुग्गियों में लगी आग से 7 साल का नफीस घायल हो गया। नफीस अपनी चप्पल निकाल लाना चाहता था जिसमें वह कामयाब भी हुआ, लेकिन उसके चेहरे का बांया हिस्सा और कंधा जल गया। नफीस उसकी मां जुलेखा, पिता ओलाद अंसारी और उसके तीन भाई बहन पांच साल पहले बिहार के पूर्णिया जिले से खुसरो पार्क की झुग्गी में आकर बसे थे। नफीस पास के ही सरकारी स्कूल में कक्षा एक का छात्र है। पिता अंधे हैं और दरगाह पर भीख मांगते हैं, मां जुलेखा आस-पास के ईलाकों में से कूड़ा बीनती है और बहन पिंकी छोटे भाई की देख-रेख करने के लिये घर पर रहती है। इतने परिश्रम के बाद नफीस के घर का चूल्हा जल पाता था, बाकी रोज़मर्रा की ज़रूरतें मुश्किल से पूरी हो पाती हैं। जुलेखा का कहना है कि झुग्गी में आग पुलिस वालों ने ही लगाई।

अपने परिवार के साथ 7 साल का नफीस जो बस्ती में लगी आग से घायल हो गया।

सलमा बेगम रोड की पटरी पर बैठे अपने बेटे ‘आज़ाद’ का आधार कार्ड देख रही हैं। आधार कार्ड पर बेटे का जन्मतिथि 30 अगस्त- 2012 और पता एसपीवाईएम, खुसरो पार्क अंकित है। पास में ही उनके पति सो रहे हैं और उनके दोनों बच्चे ‘आजाद’ और हमीदा खातून पास में खेल रहे हैं। सलमा बेगम बताती है कि उनके मां-पिता बंगाल से थे, वे दिल्ली आकर निजामुद्दीन के फुटपाथ पर रहकर जीविका चलाने लगे। उनका जन्म 22 साल पहले इसी फुटपाथ पर हुआ था और अब फिर से वह फुटपाथ पर आ गई हैं।

शादी के बाद वह अपने पति के साथ कुछ दिन सराये काले खां की झुग्गी बस्ती में रहने लगी, लेकिन किराये और आने-जाने में लगने वाले समय के कारण उन्होंने खुसरो पार्क बस्ती में ही अपनी झुग्गी बना ली। यह केवल उनके रहने की ही जगह नहीं थी अपितु उनकी जीविका का साधन भी था। उनके पति शेख जमील वहीं पर चाय की दुकान चलाते थे। सलमा बेगम- शकीना और नूरजहां के साथ मिलकर दरगाह में आने वाले लोगों की कारों की देख भाल करती हैं, जिससे उनको प्रति कार दस रू. मिल जाता है। वह खुसरो पार्क में पांच साल से रह रही हैं।

वह बताती हैं कि “शब-ए-बारात से पांच दिन पहले कुछ लोग हमें वार्निंग देकर गये थे कि अपना समान हटा लेना हम बस्ती तोड़ देंगे। उसके कुछ दिन बाद उन लोगों ने झुग्गियां तोड़ दी और फिर जला दी। उन्ही लोगों ने जलाया और उन्ही लोगों ने आग बुझाई। हम तो सरकार से यही कहना चाहते हैं कि हम जैसे रह रहे थे, हमें वैसे कही थोड़ी सी जगह दे दें रहने के लिये। छोटे-छोटे बच्चे हैं रोड पर कैसे रहेंगे?”

सलीम खान बताते हैं कि यहां पर चिल्ड्रन, लेडीज़ और फैमली के तीन सेन्टर चलते थे। वह यहीं रहते थे और इस सेंटर में काम करते हैं। सलीम बिहार के सीतामढ़ी जिले के हैं और तेरह साल से इस बस्ती में रह रहे थे। उस समय इस बस्ती में 22 झुग्गियां थी, उसके बाद 2012 में काफी लोग आ गये और 2014 तक बस्ती में काफी झुग्गियां हो गई।

वे पहले मज़दूरी करके परिवार का गुजारा करते थे और पिछले तीन साल से एसपीवाईएम (सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ़ यूथ एंड मासेस) में नौकरी करते हैं, जिसमें उनको 8500 रू. मिलता है। जिससे वह अपने पांच बच्चों सहित सात लोगों का खर्च चलाते हैं। सलीम बताते हैं कि कई बार राशन कार्ड के लिए फॉर्म भरे लेकिन उनका राशन कार्ड नहीं बना। सलीम को चिंता है कि उनके घर के साथ-साथ उनकी नौकरी भी चली गई। सलीम बताते हैं कि पुलिस वालों ने फायर ब्रिगेड का पाईप बिछा दिया उसके बाद आग लगाई और बुझाई, किसी भी मिडियाकर्मी को अन्दर नहीं आने दिया गया और उनको बाहर भगा दिया गया।

सलीम की इस बात की सच्चाई हमारे सामने भी आ गई जब निजामुद्दीन थाने के एसएचओ ने आकर हमें भी बाहर कर दिया और मेरे सामने ही पुलिसकर्मियों को आदेश दिया कि कोई भी अन्दर नहीं आए। सादी वर्दी में पुलिसकर्मी घूम रहे थे, थोड़ी देर बाद अंदर से धुंआ निकलना शुरू हो गया कुछ देर बाद दमकल की गाड़ी से आग पर काबू पाया गया।

अपने 6 दिन के नवजात शिशु के साथ अलीदा।

आलीदा अपने छह दिन के बच्चे को गोद में लिये सड़क के किनारे बैठी थी, तभी इंस्पेक्टर रामनिवास के साथ 25-30 पुलिसकर्मियों (जिसमें महिला पुलिस, भारत तिब्बत सीमा पुलिस, दिल्ली पुलिस) का जत्था आता है और उसे भगाने लगता है। आलीदा कहती है कि, “तुमने मेरी झुग्गी तो तोड़ दी, अब यहां से क्यों भगा रहे हो? मैं नहीं जाऊंगी” दो महिलाएं आलीदा का साथ देती हैं। आलीदा के पास खड़ा मैं उसके बच्चे की जन्मतिथि जानना चाहता हूं, तभी इंसपेक्टर रामनिवास मुझे यह कहते हुये भगा देते है कि “यहां से जाओ हालात खराब मत करो।”

जानकारी मांगने पर मुझे अंदर की तरफ धकेलते हुए कहा जाता है कि, “एसएचओ के पास जाओ वह बताएगा।” उसकी कोशिश थी कि मुझे किसी भी तरह की जानकारी नहीं मिल पाए। सड़क पर कुछ आगे चलते ही मुस्कान मिलती है जो आपने भाई के साथ जा रही थी, उसने चिंता प्रकट करते हुए कहा कि ‘‘इनके छोटे-छोटे बच्चे हैं, यह कहां जायेंगे?”

मुहम्मद इस्माइल मिलते हैं जो उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से हैं और लावारिस लाशों को दफनाने और जलाने का काम करते हैं। वह रिक्शा पर अपना सामान लादे फ्लाइओवर के नीचे खड़े हैं। इसी तरह का हाल नईम अख्तर, शाजिया, जाकिर हुसैन, मोहम्मद हनन खान का भी है। सभी लोग अपना आधार कार्ड दिखा रहे हैं जिस पर पते के रूप में खुसरो पार्क लिखा हुआ है। ये लोग 5-10 साल, 40 साल पहले बंगाल, बिहार, यूपी से आये हुये हैं तो किसी का जन्म इसी फुटपाथ पर हुआ है।

क्या इनका गुनाह ये है कि 40 साल से फुटपाथ पर रहने के बाद भी उनको दिल्ली का निवासी नहीं माना जा रहा है? उनके कबूतर के दड़बेनुमा घरों को भी तोड़ कर इन्हें इतनी भयानक गर्मी में खुले आसमान के नीचे छोड़ दिया गया है जिसमें छोटे-छोटे बच्चों सहित कई बुर्जु़ग भी शामिल हैं। अगर गर्मी से इनकी मौत हो जाती है तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?

क्या इनके लिये भी कोई नेता, अभिनेता, स्टार या खिलाड़ी आगे आएगा? इनका हक कौन दिलवाएगा, इनको तपती गर्मी से कौन बचाएगा? क्या मानसिक गुलामी के शिकार लोगों के पास सोचने-समझने, इंसान को इंसान मानने का विवेक खत्म हो चुका है? एक तरफ दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली मुस्कान है जो यह सोचती है कि इनके छोटे-छोटे बच्चे हैं कहां जाएंगे, दूसरी तरफ राम निवास जैसे इंस्पेक्टर हैं जिसको किसी का दुख दर्द जानना हालात खराब करने जैसा लगता है। क्या इन पुलिस वालों के बोर्ड पर शांति, न्याय, सेवा की बातें शोभा देती है?

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना
– मिर्ज़ा गालिब

नोट: Some Awesome Post ने जब हज़रत निजामुद्दीन पुलिस स्टेशन में इस बारे में जानकारी ली तो पुलिस ने बस्ती में लगी आग में अपनी किसी भी तरह की भूमिका से इनकार किया।  

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